क्या तुम एक दिन स्वयंप्रकाशी बन पाओगे ?????

क्या तुम देख पा रहे हो आज दुनिया की हालत 
यहाँ गरीब और गरीबी में डूब  रहा हैं और अमीर और अमीरी में प्रवेश कर रहा हैं 
मैं ठहरा साधारण इंसान जो सिर्फ ज़िन्दगी से झूंझ रहा अपना अस्तित्व संभालने में 
शहर के तख़्त पर रहने वाले वह लोग जो बैठकर लिख रहे हैं सबकी तक्दीरों को 
क्या आप भूख, प्यास मिटा रहे हो?
हे मित्र मेरी तुमसे बस एहि दरख्वास्त हैं  कि 
क्या तुम अमीरी और गरीबी की इन दो पहलुओं को मिला पाओगे ?
कैसी विडम्बना हैं की यह लोग तो अमीरो की चापलूसी कर अपने पेट भर रहे हैं। ....... 
हे बालक तुम आज के नौजवान हो 
तुम हमारा कल हो 
तुम हमारी रौशनी की किरण हो , 
पर क्या तुमने कभी उस झोपडी में झाँक देखा जहां सब अपनी भूक को बाँध कर सब सोते हैं 
तुम क्या जानो शेहेर के लाल एक रुपये की कीमत क्या क्या हैं जब तुम हज़ारों में खेल रहे हो 
क्या तुम इस कृत्रिम दीवार को चीर जीवन को और हसीं बना पाओगे?
होकर तुम भी अमीर क्या तुम एक गरीब की व्यथा जान पाओगे?
रहकर महलों में क्या तुम उस छोटी से झोपडी में एक सुकून की नींद सो पाओगे?
अमीर-गरीब की उस असमानता को तोड़ क्या तुम एक सामान जग निर्माण कर पाओगे? 
इस घोर अँधेरे में रौशनी का चिराग जल पाओगे?
अँधेरे से झूंझ क्या  तुम एक दिन स्वयंप्रकाशी बन पाओगे ?????


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